सहकारिता विभाग: ‘सचिवाें’ के दबदबे का अंत या महज एक और अध्याय?
सहकारिता विभाग में 'लूट' बनाम 'ईमानदारी': एआर के तेवर से भ्रष्ट सचिवों में खलबली! 'सचिवाें' का दबदबा था, दबदबा है और दबदबा रहेगा? सहकारिता का काला सच!
अजीत मिश्रा (खोजी)
सहकारिता विभाग: क्या ‘सचिवाें’ के साम्राज्य को ध्वस्त कर पाएंगे नवनियुक्त एआर?
- पूर्व एआर ने कहा ‘लूटो’, वर्तमान ने कहा ‘लूटने नहीं दूंगा’: सहकारिता में महासंग्राम!
- सहकारिता के ‘भ्रष्ट कॉकस’ को चुनौती: क्या अकेले रवि शंकर सिंह तोड़ पाएंगे सचिवों का तिलिस्म?
- एडीओ-एसीडीओ की मिलीभगत और खाद-धान का खेल: सहकारिता में किसानों का शोषण कब तक?
बस्ती। सहकारिता विभाग इन दिनों जिले में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। हालिया परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि विभाग पर भ्रष्ट सचिवों का एक ऐसा ‘दबदबा’ कायम है, जो किसी भी ईमानदार प्रशासनिक प्रयास को विफल करने की क्षमता रखता है। नवनियुक्त एआर रवि शंकर सिंह ने पदभार ग्रहण करते ही जिस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोला है, उसने विभाग के पुराने और भ्रष्ट तंत्र में खलबली मचा दी है।
‘लूट’ बनाम ‘ईमानदारी’ का संघर्ष
सहकारिता विभाग के इतिहास पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि पूर्व के एआर ने सचिवों के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के बजाय उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिया। स्थिति यह थी कि किसान खाद और धान की खरीद में हो रही धांधली से त्रस्त थे, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। सचिवों का यह वर्ग किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर खाद और धान में मनमानी लूट करता रहा।
भ्रष्ट तंत्र की कार्यप्रणाली
- सुनियोजित लूट: सचिवों का एक संगठित गिरोह आरकेवीवाई और 10 लाख रुपये की ऋण सीमा के धन को निजी व्यापार में लगा देता है।
- सरकारी निर्देशों की अनदेखी: सरकार के स्पष्ट निर्देश के बावजूद, ये सचिव जिला सहकारी बैंक में खाता नहीं खुलवाते क्योंकि वहाँ धांधली करना कठिन है, जबकि वे सारी सुविधाएं वहां उपलब्ध हैं जो अन्य बड़े बैंकों में होती हैं।
- हिसाब-किताब का खेल: खाद और धान की खरीद-बिक्री के अंतर का पैसा बैंक में जमा करने के बजाय, सचिव उसे प्रबंधकीय और प्रशासनिक व्यय के नाम पर डकार जाते हैं।
अब नवनियुक्त एआर रवि शंकर सिंह ने आते ही फरमान जारी किया है कि यदि खाद निर्धारित दर से एक भी रुपया अधिक लिया गया, तो सचिव जेल जाने के लिए तैयार रहें। इस कड़े रुख से बौखलाए सचिवों ने एकजुट होकर विरोध जताना शुरू कर दिया है। यह वही वर्ग है, जिसे पूर्व के अधिकारियों ने ‘ईमानदारी’ का पाठ पढ़ाने के बजाय ‘चोरी’ की पाठशाला में प्रशिक्षित किया था।
एडीओ और एसीडीओ की संदिग्ध भूमिका
विभाग में फैली इस अराजकता के लिए केवल सचिव ही जिम्मेदार नहीं हैं। जमीनी हकीकत यह है कि ब्लॉक स्तर के एडीओ और तहसील स्तर के एसीडीओ की मिलीभगत के बिना खाद और धान खरीद में इतना बड़ा घोटाला संभव ही नहीं था। आरोप यह भी है कि सचिव आरकेवीवाई और ऋण सीमा के धन का जो दुरुपयोग करते रहे, उसमें बैंक प्रबंधकों और उच्च अधिकारियों की मौन सहमति शामिल थी।
मिलीभगत का ‘कॉकस’
- एडीओ और एसीडीओ की संदिग्ध भूमिका: इन सचिवों का हौसला इसलिए बुलंद है क्योंकि ब्लॉक स्तर के एडीओ और तहसील स्तर के एसीडीओ कथित रूप से इस लूट में बराबर के भागीदार हैं।
- पूर्व अधिकारियों का संरक्षण: पूर्व के एआर ने इन भ्रष्ट तत्वों पर कार्रवाई करने के बजाय, उन्हें भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के तौर-तरीके सिखाए।
- ईमानदारी की सजा: जो अधिकारी ईमानदारी दिखाने की कोशिश करते हैं, उन्हें अक्सर ‘सजा’ के तौर पर ऐसी जगहों पर स्थानांतरित कर दिया जाता है।
यदि ये अधिकारी नियमित निगरानी रखते, तो धान का डायवर्जन नहीं होता और न ही खाद की खरीद-बिक्री में अंतर का पैसा बैंक में जमा होने से रुकता। सचिव अब इतने बेलगाम हो चुके हैं कि वे जिला सहकारी बैंक के बजाय निजी बैंक में खाते नहीं खुलवाते, क्योंकि वहाँ धांधली करना कठिन है।
क्या बदलेगी व्यवस्था?
नवनियुक्त एआर के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘सचिवों के इस कॉकस’ को तोड़ने की है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पूर्व में ईमानदार अधिकारियों को जानबूझकर ऐसे ‘सजा वाले’ स्थानों पर भेजा गया, ताकि वे व्यवस्था को सुधारने के बजाय खुद सिस्टम के आगे घुटने टेक दें।नवनियुक्त एआर के सख्त तेवर और चुनौतियां
- जीरो टॉलरेंस: नवनियुक्त एआर रवि शंकर सिंह ने पद संभालते ही स्पष्ट कर दिया है कि वे एक रुपया भी अतिरिक्त लूटने नहीं देंगे।
- सचिवों का प्रतिरोध: अपने मुनाफे पर आंच आते देख सचिवों ने एकजुट होकर मोर्चा खोल दिया है और सामूहिक इस्तीफे का दबाव बनाने का प्रयास किया है, जिसे एआर ने यह कहकर खारिज कर दिया कि वे अपना काम करने आए हैं।
- फर्जी नियुक्तियों का काला सच: विभाग में फर्जी नियुक्तियां भी एक बड़ी समस्या है, और अब एआर इन भ्रष्ट सचिवों को सही रास्ते पर लाने और विभाग की गंदगी को साफ करने के कठिन मिशन पर हैं।
हालाँकि, वर्तमान एआर का यह कहना कि “मैं यहाँ हीरो बनने नहीं, काम करने आया हूँ”, एक उम्मीद जगाता है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि उनके रहते समितियों पर खाद की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी। अब सवाल यह है कि क्या रवि शंकर सिंह इन भ्रष्ट अधिकारियों और सचिवों की फौज को परास्त कर किसानों को उनका हक दिला पाएंगे, या यह संघर्ष भी विभाग के पुराने फाइलों में दबकर रह जाएगा? समय ही बताएगा कि व्यवस्था में सुधार होगा या ‘सचिवाें’ का दबदबा बरकरार रहेगा।
क्या बदलेगी तस्वीर?
किसानों का मानना है कि यदि एआर रवि शंकर सिंह ने कार्यालय और समितियों से यह ‘भ्रष्ट कॉकस’ तोड़ दिया, तो यह जिले के लिए एक बड़ी जीत होगी। हालांकि, सवाल यह है कि क्या बिना एडीओ और एसीडीओ के सहयोग के एक अधिकारी अकेले इतने बड़े तंत्र से लड़ पाएगा? क्या यह संघर्ष वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन लाएगा या फिर पहले की तरह फाइलों के बीच दम तोड़ देगा, यह भविष्य के गर्भ में है।

















